समंदर को समंदर ही समझ पाए
समझना हो तो बंदर भी समझ पाए
सभी को लगता मैं उनको नहीं समझा
मेरा मन भी कहाँ कोई समझ पाए
ज़बरदस्ती से कुछ भी हाथ आना क्या
ज़रूरी होती है मर्ज़ी समझ पाए
सभी का दुख लिखा होगा किसी ने तो
लिखे को जिस पे हो बीती समझ पाए
समझने का करे इनकार मेरा दोस्त
वो बातों को मेरा भाई समझ पाए
जुआरी सिर्फ़ पढ़ पाते हैं पत्ते ही
खिलाड़ी सब की ही बाज़ी समझ पाए
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by "Dharam" Barot
our suggestion based on "Dharam" Barot
As you were reading Nature Shayari Shayari