जब जब ये दिल बंजर कम लगता है
मुझको अपना ही घर कम लगता है
जब से मैं ने तेरी आँखें देखी
मुझको तेरा पैकर कम लगता है
हर इक को रस्ता समझाने वाले
तू सब को ही रहबर कम लगता है
मुख़्बर का इक ये भी फ़न होता है
मुख़्बर सबको मुख़्बर कम लगता है
अपने अफ़साने शाबाशी लूटे
हम-सर का हर मंज़र कम लगता है
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