मुझ को वो इतना बे-ज़ार कर देता है

मेरा जीना भी दुश्वार कर देता है

जिस तरह हँस के मिलता है हर एक से
मुझ को भी वो मिलन-सार कर देता है

वो जो मुमकिन नहीं है कहानी से भी
काम वो एक किरदार कर देता है

घर हो जाते हैं मिसमार इस से मगर
इक ग़लत दाँव बेदार कर देता है

इश्क़ कुछ भी नहीं इक मरज़ के सिवा
अच्छे अच्छों को बीमार कर देता है

बोती थी पहले नफ़रत सियासत, मगर
अब ये भी काम अख़बार कर देता है

— Dileep Kumar

More by Dileep Kumar

Other ghazal from the same pen

See all from Dileep Kumar →

Politics Shayari

Shers of politics.

All Politics Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling