सब धरी रह जाती है तय्यारी मेरी

बीच में आ जाती है ख़ुद्दारी मेरी

कौन रखवाली करे इस उजड़े घर की
कौन है जो सुनता है सिसकारी मेरी

इत्तिफ़ाक़न उस ने पूछा सूरत-ए-हाल
इत्तिफ़ाक़न ठीक है बीमारी मेरी

काम पड़ जाए किसी दिन उस को मुझ से
काम आ जाए किसी दिन यारी मेरी

जानता हूँ, लोग मतलब से हैं सब साथ
फिर भी सब के साथ है ग़म-ख़्वारी मेरी

हँसते हँसते रो पड़ा वो शख़्स 'मसरूर'
जब समझ आई उसे फ़नकारी मेरी

— Dileep Kumar

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