तिरे दिल में कभी नफ़रत नहीं आई
हमें भी हिज्र में राहत नहीं आई
मुनासिब था तिरा मुझ सेे बिछड़ जाना
मुझे भी रास ये सोहबत नहीं आई
जफ़ा-कश दूसरों के घर बनाते हम
मुक़द्दर में हमारे छत नहीं आई
किसी भी तौर मैं उसको मनाता पर
मिरे हिस्से कभी ज़हमत नहीं आई
बड़ा वीराँ लगा वो घर कि जिस घर में
कभी कोई जहाँ औरत नहीं आई
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