इश्क़ तो एक बेक़रारी है
जो कि अब ज़िंदगी में जारी है
आज कल इस लिए ख़ुमारी है
अपनी कुछ मयकशों से यारी है
और ज़्यादा नशा मुझे होगा
अब पिलाने की तेरी बारी है
दोस्तो अब मेरी ग़ज़ल में बस
दर्द है और बेक़रारी है
टूट जाता है ढोते ढोते दिल
तेरी चाहत का बोझ भारी है
उस की इज़्ज़त हमेशा करना तुम
दिल तुम्हीं पे वो अपना हारी है
क्यूँ हमें कोई ग़म नहीं है अब
हम ने इस ग़म में शब गुज़ारी है
— Yash Sharma















