हम जिन्हें अपना सब समझतें हैं
वो भला हम को कब समझतें हैं
आज कल के दु चार दस लड़के
ख़ुद को गुंडों का हब समझतें हैं
रील की शायरी, नये लड़के
वो इसी को अदब समझतें हैं
'इश्क़ कोई नहीं समझता है
सब हवस को ही रब समझतें हैं
तुम नहीं समझे, हम तुम्हें जानां
ज़िन्दगी का सबब समझतें हैं
आप मेरी कमीज़ सीजे गा
आप मेरी तलब समझतें हैं
जो मदीने को जा नहीं सकते
हिन्द को ही अरब समझतें हैं
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