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रुत है ऐसी ज़हर याबी ज़िन्दगी ख़तरे में है - Shadab Asghar

रुत है ऐसी ज़हर याबी ज़िन्दगी ख़तरे में है
माजरा ये पेश है हर आदमी ख़तरे में है

हम अगर संभले नहीं तो एक दिन मिट जाएंगे
छोड़ दो ये बदगुमानी हर कोई ख़तरे में है

उन की गलियों में भटकते थे कभी हम दर बदर
ज़ुल्म ये कैसा हुआ आवारगी ख़तरे में है

इश्क़ करना थी ख़ता तो ये ख़ता हमने करी
है सज़ा इतनी बड़ी अब साँस भी ख़तरे में है

मैंने इक कुटिया बनाई और ये तूफां आ गया
बदनसीबी का ये आलम छत मेरी ख़तरे में है

उसके ख़ातिर मोमबत्ती जो जलाई बुझ गयी
दिल गवाही दे रहा है, वो किसी ख़तरे में है

- Shadab Asghar

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