क्या ही सितम निकाले गए उस जहान से
हम आसमाँ के लोग थे जीते थे शान से
ऐसा नहीं है वो हमें भाता नहीं, रक़ीब
बस तंग आ गया हूँ मैं इस खींच तान से
तू चाहता है मैं तेरी जानिब को फ़िर चलूँ
मैं तीर जो निकल गया तेरी कमान से
मिन्हा ख़लकनकुम व फ़िहा नोईदकुम
मिट्टी भी ली गई मिरी हिन्दोस्तान से
क्या हो अगर ये नर्क हो कोई जहान का
क्या हो अगर न आए कोई आसमान से
वा'दा तो कर गया है दिल-ए-ना-तमाम से
आदत है जिसकी पल में मुकरना जुबान से
कोई दोस्त ही नहीं मिरा इक तुझको छोड़ के
तू है मिरा तो लेना ही क्या दो जहान से
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