kitnii tanhaa hooñ kabhi aur main tanhaa bhi nahin | कितनी तन्हा हूँ कभी और मैं तन्हा भी नहीं

  - Firdous khan

कितनी तन्हा हूँ कभी और मैं तन्हा भी नहीं
दिन में साया तो है पर रात में साया भी नहीं

एक ही शख़्स मिला इस भरी दुनिया में मुझे
जो मेरा हो तो गया पर रहा मेरा भी नहीं

दर्द देता है हमेशा मुझे इक जख़्म बहुत
जो पुराना न हुआ और जो ताज़ा भी नहीं

रोज़े रख रख के तुम्हें माँगा तहज्जुद भी पढी
मिल गया उसको कुआँ जो ज़रा प्यासा भी नहीं

क्या हुनर है तुझे ऐ 'इश्क़ ये बरबादी का
ज़िन्दगी बाक़ी तो है आदमी ज़िन्दा भी नहीं

ख़्वाहिशें मेरी कभी पूरी हों नामुमकिन है
मेरी क़िस्मत में तो इक टूटता तारा भी नहीं

उड़ गया तोड़ के पिंजरा मेरा तोता नहीं दु:ख
गर मुझे छोड़ गया तो वो मेरा था भी नहीं

  - Firdous khan

Ghamand Shayari

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