सो नासमझी हमारी उन को नासमझी नहीं लगती
वो जिन को ग़लती अपनी तो कभी ग़लती नहीं लगती
ये जुमला कहने में शायद से उस का कुछ नहीं लगता
मैं सब कुछ लगती हूँ उस की मगर कुछ भी नहीं लगती
अगर लग जाए दिल पे बात तो उन के ही लगती है
हमें तो उन के मुँह से गाली भी गाली नहीं लगती
दिलों में आग पहले से ही भड़का रक्खी है हम ने
किसी झगड़े को भड़काने में चिंगारी नहीं लगती
नज़र जाए जहाँ तक बस उदासी ही उदासी है
उदासी इतनी है फिर भी मुझे काफ़ी नहीं लगती
ये रस्सी इश्क़ की है जो न मरने दे न जीने दे
मैं कब से लटकी हूँ इस से मुझे फाँसी नहीं लगती
— Firdous khan















