मैं तिरे झूठ पर यक़ीं करता

साफ़ इशारा न गर जबीं करता

कह रहा है तिरे गले का निशाँ
इश्क़ मुझ से तू अब नहीं करता

लफ़्ज़ होंठों पे रुक गए वर्ना
बात कुछ मैं भी दिल-नशीं करता

आँख तालिब है सिर्फ़ रातों की
ख़्वाबों को दिन हसीं नहीं करता

दस बरस से मैं ख़ाली बैठा हूँ
कौन बोला मैं कुछ नहीं करता

— Furkan Ansari

More by Furkan Ansari

Other ghazal from the same pen

See all from Furkan Ansari →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling