मय कदों में अगर मय कशी की तलब
और फिर मौत से ज़िन्दगी की तलब
एक तरफ़ा तो तेरी तलब है मुझे
एक तरफ़ा मुझे ख़ुद कुशी की तलब
दूर तक बह गए पानी में घर कहीं
है किसी गाँव को इक नदी की तलब
एक घर नौकरी और इक हम सफ़र
बस यही होती है आदमी की तलब
तोड़ डाला है इक हादसे ने मुझे
मुझ को रोने को है तीरगी की तलब
लग गया है कहीं पर दुबारा से दिल
अब नहीं होती है शा'इरी की तलब
— Furkan Ansari















