मुफ़लिसी ने बचपने के रंग कुछ ऐसे उतारे

वक़्त के मारे हुए कंधों ने फिर बस्ते उतारे

गर ज़माने भर में औरत की रहे अस्मत सलामत
क्यूँ कोई मंटो किसी किरदार के कपड़े उतारे

सब तवायफ़ हैं यहाँ और ये ज़माना एक कोठा
मौत देखो आ खड़ी है द्वार पे कुर्ते उतारे

जंग का ऐलान कर के ख़ुद तो बैठे हैं घरों में
जंग में मरने को राजा जी ने कुछ मोह्रे उतारे

बज रहा है कोई गाना फ़ैज़ का लिक्खा हुआ औ'
चल रहे हैं हाइवे पर कार के शीशे उतारे

— Gaurav Singh

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