तुम उदासी को बना कर हमनफ़स रोने लगो

सोचो कोई सुन रहा है और बस रोने लगो

मुस्कुराने की इजाज़त ही कहाँ है तुम को अब
बस यहीं तक है तुम्हारी दस्तरस रोने लगो

जेल जैसी ज़िंदगी को भी जियो तो शान से
तोड़ तो सकते नहीं हो ये कफ़स रोने लगो

उस बरस में जिस को पाया इस बरस में खो दिया
उस बरस हँसते बहुत थे इस बरस रोने लगो

ये मुहब्बत की ज़रूरत सब बदन की भूख है
लूट लेती है मुहब्बत को हवस रोने लगो

— Gaurav Singh

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