तेरे बा'द क्या ये ख़ाक ज़िन्दगी रही
और मिरा पता उदासी पूछती रही
मेरे यार मुझ को हिज्र खा गया तिरा
और मेरी माँ नज़र उतारती रही
तुम तो उठ के चल दिए मिरे क़रीब से
मेरी ख़ामुशी तुम्हें पुकारती रही
मेरे सारे ख़्वाब जल के राख हो गए
और इधर हवा चराग़ ढूँढती रही
— Gulfam Ajmeri















