ज़ेहनी बीमार किए देता है
दिल को बाज़ार किए देता है
सोचता हूँ मैं कि अब मर जाऊँ
दार दस्तार किए देता है
रो भी सकता हूँ दिखाऊँ हँस कर
हाल अदाकार किए देता है
उस को अब कुछ भी नहीं देना तुम
चीज़ बेकार किए देता है
फिर मिरी नींद को किस ने तोड़ा
ख़्वाब मिस्मार किए देता है
जुस्तजू क़त्ल नहीं हो सकती
पर मिरा यार किए देता है
— Gulfam Ajmeri















