samajh chuke hain mohabbat ka shar nahin karte | समझ चुके हैं मोहब्बत का शर, नहीं करते

  - Hasan Raqim

समझ चुके हैं मोहब्बत का शर, नहीं करते
ये दर्द अब तो दिलों पर असर नहीं करते

हर एक बार ख़ुदी पर ही तंज़ करते हैं,
हज़ार शिकवे हैं तुम सेे, मगर नहीं करते

किरायेदार हुए हैं वो अपने घर के ही,
कि दिल में रहते हुए दिल को घर नहीं करते

वो अपने हाल पे रोते हैं ग़म से घिरते वक़्त
जो दूसरों के ग़मो की क़दर नहीं करते

हम एक बार को सामान छोड़ आते हैं,
बग़ैर माँ की दुआ के सफ़र नहीं करते

  - Hasan Raqim

Dua Shayari

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