हम दिल में नफ़रत का ढेर नहीं रखते
ग़ुस्सा अपनों से ता-देर नहीं रखते
तू गर हाकिम है तो हम भी हैं आवाम
संयम हम भी ज़ियादा देर नहीं रखते
ज़मीन ये बंजर ही सही अपनी है मगर
ग़ज़ल में अपने ग़ैर का शे'र नहीं रखते
दूर कहीं न चला जाऊॅं मैं तू आ जा
लाश को लोग ज़ियादा देर नहीं रखते
— Irshad Siddique "Shibu"















