सुनो ए ना-ख़ुदा नइँ छीन सकते तुम

जो हक़ है वो मिरा नइँ छीन सकते तुम

कि मेरे जिस्म से जाँ छीन तो सकते हो
मगर ईमाँ मिरा नइँ छीन सकते तुम

हवा नफ़रत की फैला सकते तो हो पर
मोहब्बत की हवा नइँ छीन सकते तुम

मिरा जब तक ख़ुदा चाहेगा नइँ तब तक
ये इज़्ज़त-ओ-रिदा नइँ छीन सकते तुम

किसी के सर से तो छत छीन सकते हो
किसी की बद-दुआ नइँ छीन सकते तुम

दे कर तुम ज़ख़्म तो फिर ठीक कर सकते हो
निशां पर ज़ख़्म का नइँ छीन सकते तुम

-इरशाद शिबू

— Irshad Siddique "Shibu"

More by Irshad Siddique "Shibu"

Other ghazal from the same pen

See all from Irshad Siddique "Shibu" →

Ghayal Shayari

Shers of ghayal.

All Ghayal Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling