abhii tak musalsal isee men raha hooñ | अभी तक मुसलसल इसी में रहा हूँ

  - Chandan Sharma

अभी तक मुसलसल इसी में रहा हूँ
ये मत सोच तू, 'इश्क़ में, मैं नया हूँ

तबाही लिए फिर रहा साथ अपने
ज़रा दूर रह मुझ से मैं इक बला हूँ

मुझे गुल मचाना है और ख़ामुशी से
सो रस्मन मैं हर शे'र में चीखता हूँ

मैं पहले जो भी था वो "मैं" था मगर जान
मैं जो हूँ अभी आज "मैं", कौन, क्या हूँ

मुझे नाज़ है 'इश्क़ पे आपके पर
मैं अंजाम इस 'इश्क़ का जानता हूँ

तुझे भूल जाने के ख़ातिर मैं अक़सर
तुझे याद करता तुझे सोचता हूँ

मैं भी आदमी था कभी पहले पर आज
किसी की मुहब्बत में पत्थर हुआ हूँ

लगाया है ऐसे डेरा ग़म ने मुझ में
लगे है कि मैं ग़म के ख़ातिर बना हूँ

तेरे हिज्र के जलते इस सहरा में मैं
शब-ए-हिज्र से ही कहीं लापता हूँ

तुम्हारी निगाहों में कुछ और है ये
मुहब्बत को मैं खूब पहचानता हूँ

कभी आ के सुलझा दे मुझ को तू 'जाज़िब'
गया जब से है तू मैं उलझा पड़ा हूँ

  - Chandan Sharma

Relationship Shayari

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