कर्ज़ सब को चुकाना पडता है
ग़म में भी मुस्कुराना पड़ता है
इश्क़ अंजाने में हो जाता है
हम को कब दिल लगाना पडता है
दिन मोहब्बत में बीत जाता है
शब हवस में बिताना पडता है
नींद कल तक हराम थी मेरी
आज मुझ को जगाना पडता है
रूह का रूह से मिलन है इश्क़
इश्क़ में जाँ से जाना पड़ता है
कुछ नया करते रूह पर मरते
जिस्म पर तो ज़माना पडता है
मेरी हर बात टालने के लिए
उस को बस इक बहाना पडता है
आप ही रूठ जाते हैं सारे
रब्त तन्हा निभाना पडता है
दौर-ए-हाज़िर सुधारने के लिए
दौर-ए-माज़ी भुलाना पड़ता है
उस को मुझ पर यक़ीं नहीं "जाजिब"
ज़ख़्म अपना दिखाना पड़ता है















