karz sab ko chukaana padta hai | कर्ज़ सब को चुकाना पडता है

  - Chandan Sharma

कर्ज़ सब को चुकाना पडता है
ग़म में भी मुस्कुराना पड़ता है
'इश्क़ अंजाने में हो जाता है
हम को कब दिल लगाना पडता है

दिन मोहब्बत में बीत जाता है
शब हवस में बिताना पडता है

नींद कल तक हराम थी मेरी
आज मुझ को जगाना पडता है

रूह का रूह से मिलन है 'इश्क़ 'इश्क़ में जाँ से जाना पड़ता है

कुछ नया करते रूह पर मरते
जिस्म पर तो ज़माना पडता है

मेरी हर बात टालने के लिए
उसको बस इक बहाना पडता है

आप ही रूठ जाते हैं सारे
रब्त तन्हा निभाना पडता है

दौर-ए-हाज़िर सुधारने के लिए
दौर-ए-माज़ी भुलाना पड़ता है

उस को मुझ पर यकीं नहीं "जाजिब"
ज़ख़्म अपना दिखाना पड़ता है

  - Chandan Sharma

Baaten Shayari

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