सच्चे रिश्तों का उजाला अब कहाँ
रोज़ का मिलना मिलाना अब कहाँ
जब जवाँ थे तोड़ी थी दीवार भी
जिस्म में मज़बूत काँधा अब कहाँ
लोग होते थे बचाने के लिए
पर कहीं ऐसा किनारा अब कहाँ
जो मोहब्बत करता था ख़त लिखता था
इश्क़ लिखने पढ़ने वाला अब कहाँ
— Meem Alif Shaz















