"तन्हाई"

रात की ख़मोशी
और मेरी तन्हाई एक ही जिस्म है

घड़ी की साँसे काफ़ी तेज़ है
इतनी तेज़ कि लगता है कोई अपना मौजूद है

तेरे जाने के बा'द
नींद नीम के पेड़ पर जा कर बैठ गई है

मैं ने उस को पकड़ने की कोशिश की तो
कहीं और चली गई
अब तो नज़र भी नहीं आती

दीवारों को देखती रहती हूँ
शायद तेरा चहरा उभर आए

कभी कभी खिड़की पे खड़ी हो जाती हूँ
लेकिन तेरी आहट भी महसूस नहीं होती

कब तक मेरा जिस्म पिघलता रहेगा
या तेरे आने से पहले ही मैं पिघल जाऊँगी

— Meem Alif Shaz

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