
अपनी परछाई से ही डर जाएँगे इक दिन
लोग मुसाफिऱ हैं अपने घर जाएँगे इक दिन
ये महलों की ज़ीनत ये संग-ए-मरमर क्या हैं
ये भी पानी बन के समुंदर जाएँगे इक दिन
— Meem Alif Shaz
Other sher from the same pen
Shers of samundar.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling