देखी है जिस सेे दुनिया वो ज़ाविया कि था

हद्द-ए-नज़र में या'नी मंज़र रहा कि था

उलफ़त थी मेरे दिल में कितनी नहीं पता
ये दिल था जो समुंदर क़तरा हुआ कि था

कासा भी हाथ में था कपड़े फटे हुए
ख़ुद को फ़क़ीर या'नी कहता रहा कि था

इस बार ईद पर भी ओझल नहीं हुआ
खिड़की पे चाँद मेरा दिखता रहा कि था

है कब से लापता जो उस का पता मिला
या'नी है हर जगह जो है लापता कि था

क्यूँकर पता करें जब कुछ भी नहीं पता
या बे-नियाज़ होना है फ़लसफ़ा कि था

जो वक़्त हम ने खींचा माज़ी से हाल में
जो दिख रहा था फिर वो सचमुच हुआ कि था

फेंका फ़लक से हम को इक दिन ख़ुदा ने पर
जो मरहला है क्या वो पूरा हुआ कि था

वैसे उजड़ चुका है सारा चमन मगर
इक गुल था शाख़ ए दिल पर वो रह गया कि था

सब ने ख़ुदा बनाए फिर ख़ुद ख़ुदा बने
वो जो ख़ुदा था पहले वो है ख़ुदा कि था

— Kaif Uddin Khan

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Gareebi Shayari

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