पहले तो ये लगा मुझे उस पार गिर गई
फिर यूँ हुआ कि मुझ पे ही दीवार गिर गई
सींचा लहू से उस का दिल-ए-दाग़दार और
मेरे बदन में ख़ून की मिक़दार गिर गई
करने लगे बराबरी सब बर्क़ से मेरी
कुछ इस लिहाज़ से मेरी रफ़्तार गिर गई
उस की निगाह-ए-नाज़ से लश्कर भी कट गए
फिर क्या कि मेरे हाथ से तलवार गिर गई
फिर ज़िंदगी की मौज से कश्ती हुई तबाह
जब दस्त-ए-ना-रसाई से पतवार गिर गई
मैं भी मेरे निज़ाम से ऊपर चला गया
वो भी हद-ए-निज़ाम से बेकार गिर गई
— Kaif Uddin Khan















