बहुत बातें हुई हैं ताज़गी की
ग़ज़ल की क़ाफिये की शा'इरी की
मेरी आँखों ने दिल से बात छेड़ी
हुई चर्चा तुम्हारी सादगी की
हसीं दुनिया में होंगे और भी पर
अलग ही बात है तुझ सुरमई की
तुझे छूने से भी कतरा रहा हूँ
मुहब्ब्त है मेरी पाकीज़गी की
अब इस के बा'द बाक़ी क्या रहेगा
तू मूरत आख़िरी है इस सदी की
— Kanha Mohit















