रब करेगा अब मेरी उम्मीद-अफ़ज़ा सब्र कर
एतिमाद-ए-दिल मुझे कहता है मेरा सब्र कर
जाँ-फ़िशानी कर के मैं ने ढूँढा मेरा जाँ-फ़िज़ा
बोल कर जाँ-बाज़ मुझ को उस ने बोला सब्र कर
दास्ताँ आसाँ नहीं होती मुहब्बत की मगर
सर चढ़ा मुझ पे जुनूँ दीवानगी का सब्र कर
जब मुसलसल मैं ख़ुदा से मिन्नतें करता रहा
तब मुझे बोला कि मैं ने भी किया था सब्र कर
इक सिरे से बुन दिया है उस ने मुझ को लम्स से
इक सिरे से फिर उधेड़ेगा ज़माना सब्र कर
— Kanha Mohit















