hijr ab mujh pe asardaar nahin rehta hai | हिज्र अब मुझ पे असरदार नहीं रहता है

  - Khalid Azad

हिज्र अब मुझ पे असरदार नहीं रहता है
ये जुनूं तेरा लगातार नहीं रहता है

वक़्त कैसा भी हो तुम साथ निभाना सीखो
पेड़ हर साल समरदार नहीं रहता है

जो भी आ जाता है दहलीज़ पे तेरी साक़ी
फिर वो दुनिया से ख़बरदार नहीं रहता है
'इश्क़ में हो के मियाँ अक़्ल की बातें करना
कोई इतना भी समझदार नहीं रहता है

एक ही शख़्स से दो बार अगर हो जाए
फिर मुहब्बत में, वो में’यार नहीं रहता है

ज़िंदगी जो भी तेरी धुन पे नहीं नाचता है
वो अदाकार, समझदार नहीं रहता है

  - Khalid Azad

Hijr Shayari

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