'ishq nuksaan tak nahin pahuncha | 'इश्क़ नुक़सान तक नहीं पहुँचा

  - Khalid Azad

'इश्क़ नुक़सान तक नहीं पहुँचा
ये अभी जान तक नहीं पहुँचा

एक मुद्दत से घर की जानिब हूँ
फिर भी दालान तक नहीं पहुँचा

ख़्वाब तो बेशतर नज़र आए
कोई उन्वान तक नहीं पहुँचा

आज फिर मर गया किताबों में
फूल गुलदान तक नहीं पहुँचा

मेरी ख़्वाहिश थी क़ैदस छूटूॅं
कोई ज़िंदान तक नहीं पहुँचा

किस तरह हम इसे दवा कह दें
दर्द इमकान तक नहीं पहुँचा

हुस्न तेरा बहुत है ख़ूब मगर
माह-ए-कन'आन तक नहीं पहुँचा

  - Khalid Azad

Aah Shayari

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