ख़ाली जेब ही सब से भारी होती है
चलने में कितनी दुश्वारी होती है
तुझ तक सोच के आना पड़ता है मुझ को
मुझ पे घर की ज़िम्मेदारी होती है
सारी 'उम्र पे भारी होता है वो पल
बेटी बाप को जब पुचकारी होती है
अब एहसास ये गाहे गाहे होता है
'इश्क़ में अक्सर परदादारी होती है
सब हालात के इक जैसे कब होते हैं
सब की कुछ तो कुछ लाचारी होती है
उस को जीत कोई भी कैसे भाएगी
बाज़ी 'इश्क़ में जिसने हारी होती है
"ख़ालिद" खोलना उसको मुश्किल लगता है
दिल में याद की जो अलमारी होती है
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