khaali jeb hi sab se bhari hoti hai | ख़ाली जेब ही सब से भारी होती है

  - Khalid Azad

ख़ाली जेब ही सब से भारी होती है
चलने में कितनी दुश्वारी होती है

तुझ तक सोच के आना पड़ता है मुझ को
मुझ पे घर की ज़िम्मेदारी होती है

सारी 'उम्र पे भारी होता है वो पल
बेटी बाप को जब पुचकारी होती है

अब एहसास ये गाहे गाहे होता है 'इश्क़ में अक्सर परदादारी होती है

सब हालात के इक जैसे कब होते हैं
सब की कुछ तो कुछ लाचारी होती है

उस को जीत कोई भी कैसे भाएगी
बाज़ी 'इश्क़ में जिसने हारी होती है

"ख़ालिद" खोलना उसको मुश्किल लगता है
दिल में याद की जो अलमारी होती है

  - Khalid Azad

Muflisi Shayari

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