ज़िंदगी पर अज़ाब टूट गया
जब कहीं कोई ख़्वाब टूट गया
सारे जुगनू उदास बैठे हैं
क्या कोई आफ़ताब टूट गया
हुस्न के पत्थरों से टकरा कर
दिल मेरा बे-हिसाब टूट गया
जब से आंगन में उठ गई दीवार
घर का सारा निसाब टूट गया
मुफलिसी घर में क्या हुई दाख़िल
एक इज़्ज़त-मआब टूट गया
वो नज़र आ गए हैं जब मुझ को
फिर ये सारा हिजाब टूट गया
— Khalid Azad















