लोगों ने बस चेहरा चेहरा देखा है
किस ने मुझ को अंदर मरता देखा है
कितनी उम्मीदों का बोझ वो सह पाता
शायद उस ने डर से पंखा देखा है
जो लोगों के घर में आग लगाता है
मैं ने उस का घर भी जलता देखा है
कल बाज़ार में एक दिवाना चीख़ उठा
मैं ने क़ैस को ख़ुद में ज़िंदा देखा है
शायद तुम को और किसी का होना है
मैं ने कल इक ख़्वाब अधूरा देखा है
वक़्त की फितरत करवट लेना है अक्सर
शाहों के हाथों में कासा देखा है
सबने राहें पकड़ी अपनी मंज़िल की
मैं ने तो बस तेरा रस्ता देखा है
— Khalid Azad















