शौक़ का दरिया भर गया कब का
तू नज़र से उतर गया कब का
आज डाली है दुनिया ने मिट्टी
अपने अंदर मैं मर गया कब का
मुब्तला कर के इश्क़ में उस को
दूजे रस्ते गुज़र गया कब का
उस को गर इंतिज़ार है तो हो
वादे से मैं मुकर गया कब का
अब खिलौने ख़रीदे जा सकते
क़र्ज़ सर से उतर गया कब का
कैसा हूँ क्या है हाल अब मत पूछ
ग़म का बादल गुज़र गया कब का
— Rohan Hamirpuriya















