एक दिल ज़ख़्म लाखों ये क्या हो गया
मैं जिसे चाहता था ख़फ़ा हो गया
एक ज़िद थी कि मैं छोड़ दूँ ये जहाँ
एक ज़िद में ही ख़ुद से जुदा हो गया
मैं जिसे ख़्वाब में मानता था मिरा
अस्ल में वो किसी का ख़ुदा हो गया
सोचता रहता हूँ अपने बारे में अब
क्या हुआ करता था और क्या हो गया
— Krishan Kant Saini















