इक उदासी इस बदन को खा रही है
ज़िंदगी ये ग़म कहाँ से ला रही है
अजनबी सी हो गई खुशियाँ मेरी अब
अश्क आँखों से यहाँ छलका रही है
दोस्त ने वा'दा किया था उम्रभर का
दोस्ती पर आज़माती जा रही है
वक़्त की शाखों से लटकी ये जवानी
ये शज़र कमजोर करती जा रही है
मैं ही ख़ुद में यार ग़ाफ़िल हो गया था
अब ये दुनिया आइना दिख ला रही है
उसने जब छोड़ा बुरा मुझ को लगा पर
फिर ये समझा ज़िंदगी समझा रही है
डिग्रियाँ दीवार को है बस सजाती
नौकरी इनसे कहाँ मिल पा रही है
शाइरी के अब तसव्वुर से निकल जा
माँ की रोती आँख ये समझा रही है
हो रही है अब 'ललित' के नाम दुनिया
तू मगर दुनिया से मिटती जा रही है
Read Full