“शहर-ए-ख़्वाब”
कि शब तू मेरी नींदें क्यूँ नहीं लाई
कई दिन हो गए उस शहर जाना है
कि जिस का रास्ता नींदों से जाता है
बसा है ख़ूब-सूरत शहर ख़्वाबों में
यहाँ रौनक है बाज़ारों में, गलियों में
महकती है फ़ज़ा फूलों की ख़ुशबू से
उड़ आती तितलियाँ घर में दरीचों से
शब-ए-ज़ुल्मात में भी याँ उजाला है
बरसता है फ़लक से नूर रातों में
यहाँ हर शख़्स जीता है रज़ा से ख़ुद
यहाँ इंसानियत ज़िंदा है लोगों में
यहाँ रहते हैं मुझ जैसे ही दीवाने
मुहब्बत है जिन्हें पूरे ज़माने से
यहाँ आब-ओ-हवा में सिर्फ़ उल्फ़त है
कि ऐसे शहर की सब को ज़रूरत है
कि शब तू मेरी नींदें क्यूँ नहीं लाई
कि मुझ को फिर से शहर-ए-ख़्वाब जाना है















