यूँँ खड़ा है जैसे कोई पुतला है दर्द
लाश के ढेरों से निकला क़तरा है दर्द
दर्द जो देखा मिरा तो सहमा है दर्द
हौसला अच्छा है दिल से बोला है दर्द
मुस्कुराना ख़ाक अब लगता है मुझ को
ख़ाक से थोड़ा बहुत तो अच्छा है दर्द
जब किया लोगों ने नंगा मुझ को तो फिर
जिस्म को ढकने के ख़ातिर पहना है दर्द
मुस्कुरा मैं क्या लिया इस जन्मदिन पे
मुझ से यूँ रूठा हुआ है रोता है दर्द
उस जनाज़े में मुझे होना है शामिल
जिस जनाज़े में अलौकिक सिमटा है दर्द
— Madan Gopal 'AloukiK'















