हटा दे घटाओं का आँचल मिरे चाँद

मिरे दिल की धरती है बेकल मिरे चाँद

तुझे डर था दिन का मगर अब हुई शाम
नज़र आ मुझे मेरे पागल मिरे चाँद

बहुत दिन हुए हैं पराई ज़मीं पर
हमें ढूँढ़ता है फ़लक चल मिरे चाँद

घड़ी भर ज़रा देखने तो दो मुझ को
नज़र आते ही मत हो ओझल मिरे चाँद

निकल कर सर-ए-शाम कर हिज्र के इस
अधूरे फ़लक को मुकम्मल मिरे चाँद

हूँ इक उम्र से महव-ए-गर्दिश ज़मीं पर
तेरी तरह मैं भी मुसलसल मिरे चाँद

करूँगा कहाँ तक मैं तेरा तआक़ुब
मिरे पाँव हैं हिज्र से शल मिरे चाँद

सफ़र लंबा है दिल का आज इतना ही बस
मुझे नींद आने लगी कल मिरे चाँद

— MIR SHAHRYAAR

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