जाँ रंजिशों का मुझ को ये मौसम क़ुबूल है
तू साथ हो जो मेरे तो हर ग़म क़ुबूल है
या रब सवाल करने की मौहलत तो दे ज़रा
फिर उस के बा'द मुझ को जहन्नम क़ुबूल है
तेरे लगाए ज़ख़्म की लज़्ज़त ही और है
किस बदनसीब को भला मरहम क़ुबूल है
हम को ये पाक-ओ-हिंद की सरहद से क्या गरज़
चाहे जहाँ का हो हमें आदम क़ुबूल है
— Monis faraz















