फ़ैसला जो हो अहल-ए-अंबर का
चल मिटाए लिखा मुक़द्दर का
उफ कशिश ही नहीं बची अब तो
जो भी रिश्ता है वो है ऊपर का
दिल तो करता है दें तुम्हें लेकिन
दाम महँगा है जान झूमर का
अब ज़माना बदल गया मौला
भेज वर्ज़न नया पयम्बर का
आप के इंतिज़ार में गुज़रा
आख़री माह भी कैलेंडर का
— Monis faraz















