हम आसमान को पहले ज़मीन कहते थे
हमें फ़रिश्ते फ़लक का मकीन कहते थे
तू ही बता कि मैं क्यूँकर न इश्क़ करता यार
मिरे बुज़ुर्ग मोहब्बत को दीन कहते थे
वो साँवली थी मगर वो कशिश थी चेहरे में
हसीन लोग भी उस को हसीन कहते थे
हमारी अक़्ल पे पर्दे पड़े मोहब्बत में
हमें भी लोग कभी तो ज़हीन कहते थे
अब ऐसी बात तो मैं आलिमों से सुनता हूँ
जो गुज़रे वक़्त में कुछ जाहिलीन कहते थे
— Mujtaba Shahroz















