हिज्र में अश्क बहाने से भला क्या होगा
ऐ मिरे दिल ये बता तुझ से नया क्या होगा
मैं ने इक उम्र इसी डर में गुज़ारी है कि वो
गर मिरा हो नहीं पाया तो मिरा क्या होगा
ऐसे चेहरे हैं कि मैं होश गँवा देता हूँ
बंदे ऐसे हैं तो फिर सोच ख़ुदा क्या होगा
मुझ को दुनिया न मिली तू न मिला कुछ न मिला
अब मिरे साथ बता और बुरा क्या होगा
— Mujtaba Shahroz















