साथ तेरे चाहिए मुझ को सिया सी ज़िन्दगी
राम मुझ को दीजियो मत उर्मिला सी ज़िन्दगी
एक उस को सोच कर कुछ और सोचा ही नहीं
एक इन्साँ पर लुटा दी अच्छी ख़ासी ज़िन्दगी
जो कि सागर है ये दुनिया एक दिन उबलेगा ही
और फिर उड़ जाएगी ये बुदबुदा सी ज़िन्दगी
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा हम कब समझ पाएँ भला
इक दिए सी ज़िन्दगी या फिर हवा सी ज़िन्दगी
शख़्स हैं दो ज़िन्दगी में और उन की ही दुआ
मुफ्लिसी में हम ने काटी है ख़ुदा सी ज़िन्दगी
— Mukesh Guniwal "MAhir"















