वक़्त अपना हम यूँँ ज़ाया' कर रहे हैं
आप ही अपना सफ़ाया कर रहे हैं
ऐब जो सब से छुपाना चाहिए था
ऐब वो हम ख़ुद दिखाया कर रहे हैं
वो वहाँ चादर को ता'ने सो रहा है
हम यहाँ अपना पराया कर रहे हैं
देखना वो गुलमुहर जो घर में हैं दो
फल नहीं देते तो साया कर रहे हैं
— Mukesh Guniwal "MAhir"















