बात में अग़्यार की आ कर हिफ़ाज़त हम से तुम करने लगे
क्यूँ हमारी ओर हो कर भी बग़ावत हम से तुम करने लगे
हम ने तो ऐ दोस्त तुम से था फ़क़त ग़म-ख़्वार्गी का ही कहा
दोस्ताना काफ़ी था लेकिन मुहब्बत हम से तुम करने लगे
दिल-कशी अच्छी नहीं कोई तरह की भी ज़माने से तुम्हें
था बताया भी मगर ये क्या कि रग़बत हम से तुम करने लगे
कुछ मुयस्सर कब है यक-तरफ़ा तअल्लुक़ में अज़ाबों के सिवा
जानते हो तो वफ़ा क्यूँ बा-मशक़्क़त हम से तुम करने लगे
— Muntazir shrey















