कैसा रहा है ग़म हमें
है बे-असर मरहम हमें
खाता गया बस इक गिला
मारे नहीं मातम हमें
उस से मिलें बिन रंज हम
देखें वो क्यूँ बाहम हमें
रोया बहम तो अपना फिर
बेशक दिखा महरम हमें
बढ़ते रहें हम तेरी सम्त
रोके न पेच-ओ-ख़म हमें
है अहद तो हम में मगर
तन्हा न कर दे दम हमें
— Muntazir shrey















