था कब किस ने चाहा रहे ये गिला उम्र भर
वो बाशिंदा-ए-दिल रहे बे-मिला उम्र भर
तवक़्क़ो न ख़ुदस हमें है बस इस के सिवा
उन्हें चाहते ही रहें बिन सिला उम्र भर
यही इश्क़ है बीच हो फ़ासले और मैं
ख़यालों में उस के रहूँ मुब्तिला उम्र भर
तिरे लम्स से जिस फ़सुर्दा में जाँ आई थी
बिना तेरे वो गुल रहा अध-खिला उम्र भर
— Muntazir shrey















