ख़्वाबों में जब मैं तेरे गहरे उतर जाता हूँ
तेरी इन आँखों की शबनम में बिखर जाता हूँ
तेरी ख़ुशबू से महक उठते हैं वीराँ लम्हे
रात के जादू से ख़्वाबों में उतर जाता हूँ
तेरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव में बैठा जब भी
धूप को छू के तेरे रंग में भर जाता हूँ
तेरी बातों में कोई रस है कि हर इक वो लफ़्ज़
दिल की धड़कन के तरानों में उतर जाता हूँ
तेरी राहों में जो ठहरे उसे मंज़िल मिलती
मैं मुसाफ़िर हूँ मगर दूर गुज़र जाता हूँ
सुन मुसाफ़िर ये मुहब्बत में सुकूँ है हर ग़म
इस को महसूस जो कर लूँ मैं बिखर जाता हूँ
— Vikas Shah musafir















